Sampradayikta Ek Abhishap Essay Format

at  Tuesday, March 7, 2017


मनुष्य जब संसार में जन्म लेकर आँखें खोलता है तो वह अपने साथ किसी धर्म विशेष का कोई चिह्न लेकर पैदा नहीं होता है और न ही उसे विभिन्न धर्मों के लोग ही नज़र आते हैं। धीरे-धीरे जैसे वह पहचान करता है, जानने लगता है, उसे अपने और पराए की दीवार के साथ जाति और धर्म (Sampradayikta Essay in Hindi) की दीवार भी नज़र आने लगती है। सृष्टि के आदि में इसी प्रकार मानव ने केवल प्रकृति को ही अपने साथ पाया होगा, किसी भी धर्म, जाति और संप्रदाय को नहीं देखा होगा। सामाजिक व्यवस्था में प्रवेश करने पर मनुष्य ने कर्म मार्ग का विधान किया, जो कालांतर में रूढ़ियों में बँधकर धर्म और संप्रदाय के रूप में पहचाना गया।


Sampradayikta Essay in Hindi


जब कोई समाज या बहुत से व्यक्तियों का समूह किन्हीं विशेष सिद्धांतों को स्वीकार करता है, उसे संप्रदाय और मत कहा जाता है। कुछ लोग संप्रदाय या मत को धर्म भी मानते हैं, पर धर्म का स्वरूप बहुत व्यापक है जिसमें विश्व कल्याण की भावना छिपी हुई है। संप्रदाय में उन्हीं व्यक्तियों के कल्याण के विषय में सोचा जाता है, जो अपने विशेष मत में दीक्षित होते हैं। यह बात तो नहीं कि दूसरे मतों की उपेक्षा होती है, पर अपने मत के प्रति आस्था अधिक होती है। धर्म के अनेक रूप होते हैं, जैसे - व्यक्तिगत धर्म, पारिवारिक धर्म, सामाजिक धर्म, राष्ट्र धर्म, विश्व धर्म। इसीलिए इसका क्षेत्र विस्तृत होता है, पर संप्रदाय का क्षेत्र सीमित होता है। संप्रदाय के अनेक रूप नहीं होते। हम अनेक संप्रदायों में रहते हुए भी अन्य धर्म का पालन कर सकते हैं। जैसे, एक मुसलमान भी ईसाई व्यक्ति के प्राणों की रक्षा कर सकता है। एक सिक्ख, हिंदू या ईसाई इस प्रकार व्यापक धर्म पालन करता हैं। युद्ध में देश के प्रति धर्म निभाता हुआ अपने प्राणों तक को बलिदान कर सकता है। इससे स्पष्ट है, कि किन्हीं विशेष सिद्धांतों पर विश्वास करना संप्रदाय है और विश्व कल्याण के बारे में सोचना संप्रदायों से उठकर जनसेवा करना धर्म है।

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भारत में एक नहीं अनेक संप्रदाय हैं। महर्षि स्वामी दयानंद जी ने सत्यार्थ प्रकाश में लगभग एक हज़ार संप्रदायों की चर्चा की है, जिनमें अब बहुत से संप्रदाय तो समाप्त हो गए होंगे, पर बहुत से नए संप्रदाय भी बन गए हैं। भारत एक धर्म-प्रधान देश है। इसमें अनेक संप्रदायों का पैदा होना स्वाभाविक है। इतिहास साक्षी है कि एक-एक संप्रदाय की अनेक-अनेक शाखाएँ हुई और इस तरह संप्रदाय की संख्या बढ़ी। उदाहरण के रूप में वैष्णव संप्रदाय की, कृष्ण भक्ति शाखा की अनेक उपशाखाएँ बनीं और 11 से अधिक संप्रदाय इस अकेली शाखा के बने। इसी तरह से संत मत की अनेक उपशाखाएँ हुई, पर अनेक संप्रदायों के जन्म का यह अभिप्राय नहीं समझना चाहिए, कि इन संप्रदायों से देश को और देशवासियों को कोई क्षति नहीं होती है। अनेक संप्रदायों से धर्म का विकास भी होता है, मानव में भक्ति भावना पैदा होती है। अनेक संप्रदायों का होना देश में धर्म के उत्थान को प्रकट करता है।

लेकिन जब संप्रदाय के लोगों में अंधविश्वास और कट्टरता आ जाती है तो वह देश के लिए घातक सिद्ध होती है। अपने ही संप्रदाय के प्रति ईमानदार रहना बुराई नहीं, लेकिन दूसरों को हीन मानकर उसकी निंदा करने से विवाद खड़ा होता है। सांप्रदायिकता धर्म से जुड़कर जातिवाद को जन्म देती है, जिससे एक-दूसरे के प्रति घृणा की भावना जन्म लेती है। धर्म में मानव मात्र के कल्याण की कामना होती है। किसी भी धर्म के पैगंबर या अवतार ने किसी दूसरे धर्म या जाति के लोगों में भेद बताकर उन्हें सताने या मारने की शिक्षा नहीं दी है। सभी प्राणियों को वे एक ही दृष्टि से देखते हैं। एक धर्म किसी दूसरे धर्म का विरोध नहीं करता है, अपितु सत्य के शोध की प्रक्रिया अपनाता है। धर्म विश्व में मानव के बीच की दूरी को तोड़ने का संदेश देता है।

हमारे देश में यद्यपि अनेक जातियाँ रही हैं, पर उनमें सांप्रदायिक सद्भाव रहा है। सभी स्वतंत्र रूप में अपने-अपने धर्मों का पालन करते रहे हैं। हमारा इतिहास साक्षी है कि मुसलमानों के आगमन तक हमारे देश में सांप्रदायिक सद्भाव बना रहा। अकबर जैसे शासकों ने इसके लिए सराहनीय प्रयास किए। औरंगज़ेब जैसे शासकों की धार्मिक कट्टरता ने तथा अंग्रेज़ों की कुटिल नीति ने सांप्रदायिकता का घिनौना खेल खेला। राज के लोभियों ने हिंदू और मुसलमानों को परस्पर लड़ाने और स्वयं राज्य करने के लिए भेद बीज बो दिए। यह स्थिति इतनी विकट हो गई थी, कि सन् 1947 में हिंदू और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक दंगे हुए और इनमें अनेक निर्दोष, असहाय मानव मौत के घाट उतार दिए गए। इसी आधार पर देश की धरती बाँट दी गई, देश के टुकड़े हो गए। पाकिस्तान और हिंदुस्तान दो देश बन गए। विभाजन के बाद के सांप्रदायिक दंगे तो इतिहास पर कलंक के समान हैं। भारत में विदेशी शक्तियों ने इस देश में खून की होली खेलने के लिए अनेक प्रयास करवाए। सन् 1984 में जो सांप्रदायकि दंगे हुए, उनसे तो भारतवासियों के सिर लज्जा से झुक गए।

सांप्रदायिक दंगों में आज जन-साधारण को उलझाने के लिए राजनीति की कपट-कुचालें भी सम्मिलित हो गई हैं। राजनीतिज्ञ अपने ईमान और धर्म को बेचकर केवल सत्ता प्राप्ति के लिए इसे अपना साधन बनाते हैं। आज सांप्रदायिक दंगों के पीछे अवैध कार्य करने वाले असामाजिक तत्व भी साथ हो गए हैं। इनके साथ संगठित गिरोह कार्य करते हैं। इनके साथ अनेक अपराधी होते हैं, जो खून-खराबा कर देश को सांप्रदायिकता की आग में झोंक देते हैं। सन् 1993 में मुंबई में हुए सांप्रदायिक दंगों में इसी प्रकार के देश-द्रोही तत्वों का हाथ पाया गया है।

इन दंगों का सबसे बुरा असर दैनिक मज़दूरी करने वाले मज़दूरों, मेहनतकशों, रिक्शा चालकों, ताँगेवालों तथा खोमचे और ठेले वालों पर पड़ता है। साधारण व्यापारी जो दैनिक आय से रोटी कमाते हैं, वे भी इससे होते हैं। सभी लोगों को इससे अपने दैनिक कार्यों में व्यावधान झेलना पड़ता है। यातायात की व्यवस्था भंग होने से लोग कई बार यात्रा के बीच में ही परेशानी का सामना करते हैं। कर्फ्यू लग जाने के कारण तो दशा और भी शोचनीय हो जाती है। पंजाब और कश्मीर के लोगों ने इस भयावह स्थिति की यातना को झेला है। इससे अनेक घर लुट जाते हैं, निर्दोष और मासूम लोग सज़ा भोगते हैं।

भारत में अनेक धर्मों के लोग रहते हैं। ऐसी स्थिति में केवल प्रेम और भाईचारा, सांप्रदायिक सौहार्द देश को प्रगति की ओर ले जा सकते हैं। हमारी राजनीति ने ‘अल्पमत‘ और ‘बहुसंख्यक‘ जैसे शब्दों और वर्गों को बना कर विवाद को नया रूप दिया है। आज देश में श्री राम मंदिर और बाबरी मस्ज़िद के विवाद को दृष्टि ओझल नहीं किया जा सकता है। वोट की राजनीति ने संप्रदायों को भड़काया है और धर्मांध तथा कट्टरपंथियों ने इसे हवा दी है। इस संबंध में बापू ने कहा था- "हिंदू, मुस्लिमान, पारसी, सिक्ख, ईसाई आदि सब इस देश के रहने वाले हैं। उनके मंदिर, मस्ज़िद, गुरूद्वारे अलग-अलग हो सकते हैं, परंतु भारत रूपी जो बड़ा मंदिर है, वह सबका है." सब धर्मों के लोग एक ही ईश्वर की पूजा करते हैं। एकता के सूत्र को मज़बूत करने से ही यह विभिन्न धर्मों का देश मज़बूत होगा। जो स्वार्थी लोग हैं, उनकी चालों से राष्ट्र में जनमत जगाकर इससे राष्ट्र को बचाया जा सकता है। राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त के शब्दों में -

क्या सांप्रदायिक भेद से है, ऐक्य मिट सकता अहो।
बनती नहीं क्या एक माला विविध सुमनों की कहो?

Sampradayikta par nibandh (Essay on Sampradayikta in Hindi)

प्रस्तावना- सम्प्रदाय का अर्थ है – विशेष रूप से देने योग्य, सामान्य रूप से नहीं अर्थात् हिन्दूमतावलम्बी के घर में जन्म लेने वाले बालक को हिन्दू धर्म की ही शिक्षा मिल सकती है, दूसरे को नहीं। इस प्रकार से साम्प्रदायिकता का अर्थ हुआ एक पन्थ, एक मत, एक धर्म या एक वाद। न केवल हमारा देश ही अपितु विश्व के अनेक देश भी साम्प्रदायिक हैं। अतः वहां भी साम्प्रदायिक हैं। अतः वहाँ भी साम्प्रदायिकता है। इस प्रकार साम्प्रदायिकता का विश्व व्यापी रूप है। इस तरह यह विश्व चर्चित और प्रभावित है।

साम्प्रदायिकता के दुष्परिणाम– साम्प्रदायिकता के अर्थ आज बुरे हो गए हैं। इससे आज चारों और भेदभाव, नफरत और कटुता का जहर फैलता जा रहा है। साम्प्रदायिकता से प्रभावित व्यक्ति, समाज और राष्ट्र एक-दूसरे के प्रति असद्भावों को पहुँचाता है। धर्म और धर्म नीति जब मदान्धता को पुन लेती है। तब वहाँ साम्प्रदायिकता उत्पन्न हो जाती है। उस समय धर्म-धर्म नहीं रह जाता है वह तो काल का रूप धारण करके मानवता को ही समाप्त करने पर तुल जाता है। फिर नैतिकता, शिष्टता, उदारता, सरलता, सहदयता आदि सात्विक और दैवीय गुणों और प्रभावों को कहीं शरण नहीं मिलती है। सत्कर्त्तव्य जैसे निरीह बनकर किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो जाता है। परस्पर सम्बन्ध कितने गलत और कितने नारकीय बन जाते हैं। इसकी कहीं कुछ न सीमा रह जाती है और न कोई अुनमान। बलात्कार, हत्या, अनाचार, दुराचार आदि पाश्विक दुष्प्रवृत्तियाँ हुँकारने लगती हैं। परिणामस्वरूप मानवता का कहीं कोई चिन्ह नहीं रह जाता है।

इतिहास साक्षी है कि साम्प्रदायिकता की भयंकरता के फलस्वरूप ही अनेकानेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्ररीय स्तर पर भीषण रक्तपात हुआ है। अनेक राज्यों और जातियों का पतन हुआ है। अनेक देश साम्प्रदायिकता के कारण ही पराधीनता की बेडि़यों में जकड़े गए हैं। अनेक देशों का विभाजन भी साम्प्रदायिकता के फैलते हुए जहर-पान से ही हुआ है।

साम्प्रदायिकता का वर्तमान स्वरूप– आज केवल भारत में ही नहीं अपितु सारे विश्व में साम्प्रदायिकता का जहरीला साँप फुँफकार रहा है। हर जगह इसी कारण आतंकवाद ने जन्म लिया है। इससे कहीं हिन्दू-मुसलमान में तो कहीं सिक्खों-हिन्दुाओं या अन्य जातियों में दंगे फसाद बढ़ते ही जा रहे हैं। ऐसा इसलिए आज विश्व में प्रायः सभी जातियों और धर्मों ने साम्प्रदायिकता का मार्ग अपना लिया है। इसके पीछे कुछ स्वार्थी और विदेशी तत्व शक्तिशाली रूप से काम कर रहे हैं।

उपसंहार– साम्प्रदायिकता मानवता के नाम पर कलंक है। यदि इस पर यथाशीघ्र विजय नहीं पाई गई तो यह किसी को भी समाप्त करने से बाज नहीं आएगा। साम्प्रदायिकता का जहर कभी उतरता नहीं है। अतएव हमें ऐसा प्रयास करना चाहिए कि यह कहीं किसी तरह से फैले ही नहीं। हमें ऐसे भाव पैदा करने चाहिएं जो इसको कुचल सकें। हमें ऐसे भाव पैदा करना चाहिएं-

‘मजहब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना।
हिन्दी है हम वतन है, हिन्दोस्ता हमारा।’

तथा

‘चाहे जो हो धर्म तुम्हारा, चाहे जो भी वादी हो,
नहीं जी रहे अगर देश के लिए तो तुम अपराधी हो।’

(500 शब्द words Sampradayikta par nibandh)

 

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